बिहारनामा : भिखारी ठाकुर का मंचन

बिहारनामा बिहार की सांस्कृतिक दूरी को भी पाटने का एक प्रयास है| सांस्कृतिक दूरी को पाटने का काम वर्षों से हो रहा है| अजनबीपन खत्म हुआ है लेकिन जिस दिशा में प्रयास होना चाहिए, उस दिशा में शायद नहीं हो रहा | इस दूरी को पाटने का काम विंध्यवासिनी देवी ने कीं, जिन्होंने अपने समय में गीतों की रचना शुरू कि तो सभी बिहारी भाषाओं का मिलान एक गीत में करा देती थीं. सिर्फ रचते हुए नहीं, गाते हुए. वह संस्कार गीतों को,छठ गीतों को, दूसरे रचे गये आधुनिक गीतों को एक अलग रंग में ढाल रही थी, जिसे सब समझते थे,सब अपना ही मानते थे. गायन की दुनिया में शारदा सिन्हा तो एक पुल ही बन गयी मिथिला औ भोजपुरी के बीच दूरी को खत्म करने के लिए बिहारनामा बिहार की सांस्कृतिक दूरी को भी पाटने का एक प्रयास है|

शारदा जी के गीतों का जादू था की भोजपुर के इलाके में मैथिली के गीत सुने जाने लगे, मिथिला के इलाके में भोजपुरी के. बिहार की संस्कृति में कई योगदानों में शारदाजी का एक अहम योगदान यह भी है. यह शारदाजी के अपने समर्पण का मामला था, जिसकी वजह से उनकी आवाज किसी भाषा की नहीं बल्कि पूरे बिहार की सबसे भरोसेमंद और सबसे करीब की आवाज बन गयी.

  • बिहारनामा का आयोजन बिहार संग्रहालय, पटना के सहयोग से किया जा रहा है।
  • बिहार की संगीत परंपरा और भारतीय संगीत में उसका योगदान पर व्याख्यान|
  • गायन – लोकगीतों की स्त्रियां और लोकगीतों में स्त्रियां

दस जुलाई को भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि के अवसर पर जिस पटने में बिहारनामा का आयोजन हो रहा है, उस शहर से भिखारी ठाकुर का गहरा रिश्ता रहा. यहां उनके कद्रदान बहुत लोग थे.

भिखारी ठाकुर की तरह पेशेवर कलाकार कोई हुआ नहीं. वे नाच मंडली बनाये, गांव के साधारण कलाकारों को लेकर देश भर में तमाशा करने जाते रहे लेकिन उन्होंने कला और कलाकारों का मर्याद रखी. वे ऐसे ही कहीं जाकर, बिना बुलाये,अपना तमाशा प्रदर्शित नहीं करते थे. उनकी अपनी शर्तेंं होती थी. आप उन्हें बुलाइयेगा तो आनेजाने का प्रबंध बताइये यानी भाड़ा वगैरह. जहां तमाशा होना है, वहां रूकने,भोजनपानी का प्रबंध बताइये. इतनी शर्तों पर तब भी वे जाते थे, लोग बुलाते थे. कहने का मतलब कलाकार को पेशेवर होना ही चाहिए, उसकी अपनी शर्तेंं होनी ही चाहिए. यह अच्छी बात है. असल बात तो यह है कि वह कहीं पेशेवर शर्तों पर जाकर डीलिवर क्या कर रहा है? सुना क्या रहा है? दिखा क्या रहा है? भिखारी अपनी शर्तों पर जाकर अपने मन का ​सुनाते-दिखाते थे. पब्लिक डिमांड को बदलते थे, पब्लिक ​डिमांड के अनुसार नहीं चलते थे. उनके जीवन के आखिरी शो धनबाद के लाइकडीह कोलियरी का प्रसंग सब जानते होंगे. वहां वह बुढ़ापे की अवस्था में मंच पर उतरे थे. सूदखोरों और माफियाओं के सौजन्य से आयोजन हुआ था. भिखारी मंच पर उतरे और कहने लगे कि जेकरा बैल गाय भइंस के खोरहा बीमारी हो गईल बा ओकरा के हम सलाह देत बानी कि उ पांच गो सूदखोरन के नाम पीपर के पतई प लिख के आपन मवेशी के खिया देबे लोग. खोरहा दूर हो जाई सूदरखोरन के नाम से. पाप, पाप के काट दिही. हंगामा मच गया था उनके जीवन के उस आखिरी आयोजन में. सूदखोर, जो आयोजक थे,पानी पानी होकर पानी मांग रहे थे. विरोध करने लगे. फिर भिखारी ने बेटी बेचनेवालों को ललकारा. उन्होंने लोगों को कहा कि जो बेटी बेचे, समाज में उसका हुक्का पानी बंद करो. धनबाद के उस आयोजन का असर यह था कि धनबाद, जो कि सूदखोरों का सबसे बड़ा अड्डा था, वहां सूदखोरी के खिलाफ पहली बार कोई संगठन बना. और वहां से तमाशा देखकर लौटने के बाद लोगों ने अपनी बेटी नहीं बेचने का संकल्प लिया, जो बेचेगा उसे समाज से बहिस्कृत करने का संकल्प भी. ऐसे थे भिखारी.

भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि पर यह आयोजन है. आइयेगा तब नु सुनिएगा,जानिएगा,देखिएगा,बुझिएगा.

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Anish Kumar Singh

Amature Photographer and Content Writer. From History to Street to landscape to Food everything.

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